राहु–केतु और वह विच्छेद,
राहु–केतु और वह विच्छेद, जिसका कोई उत्तर नहीं मिला
सब कुछ सामान्य प्रतीत हो रहा था।
संवाद थे, अपनत्व था, भविष्य की कल्पनाएँ थीं।
किन्तु अचानक, बिना किसी स्पष्ट कारण के,
वह संबंध शिथिल होने लगा।
न कोई तीव्र विवाद,
न कोई स्पष्ट आरोप,
फिर भी एक मौन-सा फैल गया।
जिस व्यक्ति से आत्मीयता थी,
वही व्यक्ति भावनात्मक रूप से दूर होता चला गया।
प्रश्न उठते रहे—
“दोष मेरा कहाँ था?”
“ऐसा क्या परिवर्तित हो गया?”
यहीं से राहु–केतु का प्रभाव आरम्भ होता है।
राहु मनुष्य को भ्रम में डालता है।
वह अस्थायी आकर्षण को शाश्वत प्रेम का रूप देता है।
जिस संबंध का आधार स्थिर नहीं होता,
वह अत्यधिक प्रबल प्रतीत होने लगता है।
इसके पश्चात केतु का प्रवेश होता है।
केतु वैराग्य देता है।
भावनाओं को धीरे-धीरे काट देता है।
मनुष्य स्वयं कहने लगता है—
“अब कुछ भी अनुभूति नहीं होती।”
ऐसे संबंधों का अंत
स्पष्टीकरण के बिना होता है।
न समापन होता है,
न समाधान।
केवल शून्यता,
मानसिक पीड़ा
और आत्मदोष की प्रवृत्ति शेष रह जाती है।
वास्तव में, ऐसे विच्छेद
साधारण नहीं होते।
ये कर्मजन्य संबंध-वियोग होते हैं।
इनका उद्देश्य संबंध को निभाना नहीं,
अपितु आत्मबोध कराना होता है।
जब राहु–केतु की दशा या गोचर सक्रिय होता है,
तो संबंध समाप्त नहीं होता—
भ्रम समाप्त होता है।
कुंडली का अवलोकन किए बिना किए गए उपाय
अनेक बार पीड़ा को और गहरा कर देते हैं।
इसलिए समाधान भी व्यक्तिगत ही होना चाहिए।
यदि यह लेख पढ़कर आपको लगा—
“यह तो मेरे जीवन की ही कथा है”
तो यह केवल संयोग नहीं है।
यह आपकी जन्मकुंडली का संकेत है।
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